October 18, 2026
MG NEWS

मरुधर गूंज, बीकानेर (18 अक्टूबर 2026)।

शारदीय नवरात्र 2026 में इस बार दुर्गा अष्टमी की तिथि को लेकर काफी चर्चा है। नवरात्रि के आठवें दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप महागौरी की पूजा का विधान है। इस दिन व्रत रखकर घर-घर माता रानी की पूजा की जाती है। नवरात्रि में कुछ भक्त प्रतिपदा तिथि और अष्टमी तिथि का व्रत रखते हैं तो कुछ पूरे नौ दिन व्रत रखकर कन्या पूजन करते हैं। नवरात्रि की अष्टमी तिथि को दुर्गा अष्टमी, महाअष्टमी और अष्टमी पूजा के नाम से भी जानते हैं। अष्टमी तिथि की रात को महानिशा की पूजा अर्चना भी की जाती है, यह एक विशेष तांत्रिक एवं वैदिक पूजा है. यह पूजा अष्टमी तिथि की मध्यरात्रि यानी निशीथ काल और रात के सातवें प्रहर में की जाती है। आइए जानते हैं महानिशा पूजा और कन्या पूजन की तिथियों के बारे में…

अंग्रेजी कैलेंडर नहीं ऐसे तय होती हैं तिथियां

शारदीय नवरात्रि में दुर्गा अष्टमी की पूजा हर वर्ष आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को की जाती है। इस बार नवरात्रि में तिथि का यह विस्तार दो कैलेंडर दिनों में होने के कारण अष्टमी की पूजा, तांत्रिक साधना, संधि पूजा और कन्या पूजन को लेकर अलग-अलग परंपराओं में देखने को मिल रही है। सनातन धर्म में पूजा का निर्णय केवल अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख देखकर नहीं, बल्कि तिथि, पूजा के समय, स्थानीय पंचांग और अपनी कुल परंपरा के अनुसार किया जाता है। इसलिए यह समझना आवश्यक है कि सामान्य गृहस्थ पूजा, तांत्रिक साधना और कन्या पूजन के नियम एक-दूसरे से अलग हो सकते हैं।

नवरात्रि दुर्गा अष्टमी

आश्विन मास की अष्टमी तिथि की शुरुआत – 18 अक्टूबर, सुबह 8 बजकर 28 मिनट से

आश्विन मास की अष्टमी तिथि की समापन – 19 अक्टूबर, सुबह 10 बजकर 51 मिनट तक

उदिया तिथि के आधार पर महाअष्टमी की पूजा 19 अक्टूबर दिन सोमवार को की जाएगी। लेकिन जिन घरों में अष्टमी की कुलदेवी पूजा या तंत्र-मंत्र व साधना की जाती है, वे 18 अक्टूबर की रात को ही अष्टमी तिथि की पूजा करेंगे।

तांत्रिक अष्टमी की रात 18 अक्टूबर को ही क्यों?

18 अक्टूबर यानी आज सुबह सप्तमी तिथि रहने से आज भी मां कालरात्रि की उपासना की जाएगी। वहीं अष्टमी तिथि के आज रात्रिकाल में विद्यमान रहने के कारण तांत्रिक परंपराओं में इसी रात को अष्टमी की विशेष साधना के लिए महत्त्वपूर्ण है। तंत्र साधना में केवल सूर्योदय या दिन की तारीख ही निर्णायक नहीं होती। साधना के निर्धारित काल में कौन-सी तिथि किस समय विद्यमान है, इसका भी विशेष महत्त्व होता है। इसी आधार पर 18 अक्टूबर की रात्रि को अष्टमी की तांत्रिक उपासना से जोड़ा जा रहा है। हालांकि, यह ध्यान रखना चाहिए कि महानिशा पूजा और तांत्रिक अनुष्ठानों के नियम संप्रदाय, साधना-पद्धति तथा स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग हो सकते हैं। यह पूजा प्रत्येक गृहस्थ के लिए अनिवार्य नहीं है।

महानिशा पूजा का शुभ मुहूर्त : आज मध्य रात्रि 11:36 बजे से 12:36 बजे तक (कुल अवधि : 1 घंटा)

दक्षिणमार्ग और वाममार्ग : अष्टमी उपासना की दो परंपराएं

शाक्त उपासना की विभिन्न परंपराओं में साधना के अलग-अलग मार्ग बताए गए हैं। इनमें दक्षिणमार्ग और वाममार्ग का उल्लेख विशेष रूप से मिलता है।

दक्षिणमार्ग की उपासना : इस मार्ग में सात्त्विक पूजा, मंत्र-जप, दुर्गा सप्तशती का पाठ, पुष्प अर्पण, दीप प्रज्वलन और देवी की आराधना को प्रमुखता दी जाती है।गृहस्थ भक्त अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार इस मार्ग से मां दुर्गा की पूजा कर सकते हैं।

वाममार्ग की उपासना : कुछ विशिष्ट तांत्रिक परंपराओं में रात्रिकालीन साधना और विशेष अनुष्ठानों का विधान मिलता है। महानिशा पूजा भी कुछ परंपराओं में इसी संदर्भ में की जाती है। इसके नियम सामान्य गृहस्थ पूजा से भिन्न हो सकते हैं।
ऐसी साधना किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन और परंपरागत विधि के अनुसार ही करनी चाहिए। बिना उचित दीक्षा, प्रशिक्षण और मार्गदर्शन के जटिल तांत्रिक अनुष्ठान करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। अगर आप माता रानी के सामान्य भक्त हैं तो रात्रि में मां दुर्गा के नाम का स्मरण, दुर्गा मंत्र का जप, दुर्गा चालीसा का पाठ या अपनी श्रद्धा के अनुसार शांतिपूर्वक आराधना कर सकते हैं।

महानिशा पूजा का महत्व

महानिशा पूजा शाक्त और तांत्रिक परंपरा में मां दुर्गा की रात्रिकालीन उपासना का विशेष विधान है। नवरात्र में कुछ परंपराओं के अनुसार अष्टमी की मध्यरात्रि में की जाने वाली इस साधना को अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इसे देवी की शक्ति, साधना और आध्यात्मिक जागरण से जोड़कर देखा जाता है। इस पूजा में मुख्य रूप से आदिशक्ति मां दुर्गा, मां काली और देवी के अन्य शक्तिशाली स्वरूपों की उपासना की जाती है।

महानिशा पूजा के प्रमुख नियम

  • साधक को शारीरिक और मानसिक शुद्धता बनाए रखनी चाहिए।

  • पूजा अपने गुरु द्वारा निर्धारित विधि और मंत्रों के अनुसार करनी चाहिए।

  • दीप प्रज्वलन, मंत्र-जप, ध्यान और देवी स्तुति परंपरा के अनुसार किए जाते हैं।

  • इस साधना में संयम, एकाग्रता और श्रद्धा का विशेष महत्त्व है।

  • जटिल तांत्रिक अनुष्ठान बिना योग्य गुरु के मार्गदर्शन के नहीं करने चाहिए।

क्या गृहस्थ यह पूजा कर सकते हैं?

गृहस्थ भक्त मां दुर्गा का सामान्य पूजन, दुर्गा चालीसा का पाठ और मंत्र-जप कर सकते हैं। विशेष तांत्रिक साधनाओं के नियम अलग होते हैं, इसलिए उन्हें बिना दीक्षा या उचित मार्गदर्शन के नहीं करना चाहिए। महानिशा पूजा का मूल भाव मां आदिशक्ति के प्रति श्रद्धा, आत्मसंयम और आध्यात्मिक साधना है।

दुर्गा अष्टमी का क्यों है विशेष महत्त्व?

हिंदू पंचांग में अष्टमी चंद्र मास की प्रमुख तिथियों में से एक है। शाक्त परंपरा में इस दिन मां दुर्गा की उपासना, व्रत, मंत्र-जप और दुर्गा सप्तशती के पाठ का विशेष महत्त्व माना जाता है। नवरात्र की अष्टमी पर अनेक परिवार कन्या पूजन करते हैं। वहीं बंगाल सहित पूर्वी भारत की दुर्गा पूजा परंपराओं में महाअष्टमी, पुष्पांजलि और संधि पूजा का विशेष स्थान है। संधि पूजा अष्टमी और नवमी तिथि के संधिकाल में की जाती है। बंगाली परंपरा में इस समय का विशेष धार्मिक महत्त्व है। परंपरागत विधान में 108 दीपक और 108 कमल पुष्पों के अर्पण का उल्लेख मिलता है। कुछ बंगाली पंचांगों के अनुसार 19 अक्टूबर को महाअष्टमी पुष्पांजलि का आयोजन बताया जा रहा है। दिल्ली के लिए संधि पूजा का संभावित समय सुबह लगभग 10:27 से 11:15 बजे के बीच बताया जा रहा है।

कन्या पूजन कब करें?

नवरात्र में कन्या पूजन को कन्या भोज या कुमारी पूजन भी कहा जाता है। उत्तर भारत के अनेक परिवारों में अष्टमी या नवमी के दिन छोटी कन्याओं को देवी के स्वरूप में आमंत्रित करके उनका पूजन किया जाता है। कन्या पूजन के लिए सबसे उत्तम दिन 19 अक्टूबर और 20 अक्टूबर हैं। महानिशा पूजा आज की जाएगी लेकिन अष्टमी तिथि का व्रत 19 अक्टूबर को रखा जाएगा, ऐसे में आप अपने परिवार की परंपरा के अनुसार अष्टमी तिथि या सोमवार को नवमी तिथि को कन्या पूजन कर सकते हैं।

कन्या पूजन का दिन इन बातों पर निर्भर है :

  • परिवार में चली आ रही कुल परंपरा और कुलाचार।

  • अष्टमी या नवमी की तिथि के अनुसार पूजा करने की पारिवारिक रीति।

  • स्थानीय पंचांग और पूजा का निर्धारित मुहूर्त।

  • परिवार के पुरोहित या गुरु का मार्गदर्शन।

इसलिए अगर आपके परिवार में पीढ़ियों से अष्टमी या नवमी पर कन्या पूजन करने की परंपरा चली आ रही है, तो उसी के अनुसार निर्णय लेना उचित होगा। तिथि को लेकर असमंजस होने पर अपने परिवार के बड़े-बुजुर्ग या स्थानीय पुरोहित से सलाह लें।

श्रद्धा और परंपरा का सम्मान ही पूजा का सार

दुर्गा अष्टमी केवल एक तिथि नहीं बल्कि शक्ति, भक्ति, साहस और आत्मशुद्धि का पर्व है। मां कालरात्रि की आराधना हमें भय और नकारात्मकता से लड़ने की प्रेरणा देती है, जबकि मां महागौरी की उपासना शांति, पवित्रता और करुणा का संदेश देती है। चाहे आप 18 अक्टूबर की रात्रि में मंत्र-जप करें, 19 अक्टूबर को महाअष्टमी की पूजा करें या अपने कुलाचार के अनुसार 20 अक्टूबर को कन्या पूजन करें, अपने अनुष्ठान का समय स्थानीय पंचांग और पारिवारिक परंपरा से सुनिश्चित करें। मां दुर्गा की उपासना में तिथि और विधि का अपना महत्त्व है, लेकिन श्रद्धा, शुद्ध भाव, विनम्रता और सेवा का स्थान सर्वोपरि है। जय माता दी!