
मरुधर गूंज, बीकानेर (07 सितम्बर 2026)।
ज्योतिषचर्या पंडित महेंद्र कुमार ने बताया कि बछ बारस भाद्रपद कृष्ण पक्ष द्वादशी को मनाया जाता है, जबकि अमांत पंचांग के अनुसार, यह श्रावण कृष्ण पक्ष द्वादशी को पड़ता है। हालांकि, यह एकमात्र नाम है जो अलग है, क्योंकि बछ बारस द्वादशी अमांत और पूर्णिमांत दोनों में एक ही दिन मनाई जाती है। भारत के कुछ इलाकों में, बछ बारस जैसा ही एक त्योहार गोवत्स द्वादशी या वासु बारस के तौर पर मनाया जाता है। गोवत्स द्वादशी धनतेरस से एक दिन पहले मनाई जाती है, जिससे पांच दिन चलने वाले दिवाली के उत्सव की शुरुआत होती है।
बछ बारस की तिथि और समय
बछ बारस सोमवार, 7 सितंबर, 2026 को है
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प्रदोषकाल बछ बारस मुहूर्त – 07:29 PM से 09:44 PM तक
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समय – 02 घंटे 15 मिनट
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द्वादशी तिथि शुरू – 07 सितंबर, 2026 को सुबह 07:33 AM बजे
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द्वादशी तिथि खत्म – 08 सितंबर, 2026 को सुबह 05:12 AM बजे
बछ बारस पर चौघड़िया मुहूर्त
व्रत परिचय और व्रतोत्सव जैसे शास्त्रों में, बछ बारस को वत्स द्वादशी कहा गया है। इस शुभ मौके पर, गायों और उनके बछड़ों को खूबसूरती से सजाया जाता है और पूरी श्रद्धा और पवित्रता के साथ उनकी पूजा की जाती है। यह व्रत मुख्य रूप से महिलाएं अपने बच्चों की भलाई और खुशहाली के लिए रखती हैं।
बछ बारस का महत्व
पुरानी मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान कृष्ण ने गोचारण लीला की थी, जिसका मतलब है कि वे पहली बार गायों को चराने गए थे। इसलिए, भक्त इस दिन भगवान कृष्ण की पूजा भी करते हैं। भगवान कृष्ण को समर्पित मंदिरों में इस मौके को यादगार बनाने के लिए उनकी गोचारण लीला के सीन और नाटक दिखाए जाते हैं। बछ बारस को बछड़ा वरस या बछड़ा वारस भी कहते हैं।
बछ बारस द्वादशी व्रत पूजा विधि
- संतान रक्षा की कामना : इस दिन माताएं अपनी संतान की सुरक्षा, अच्छी सेहत और दीर्घायु के लिए निर्जला या एकभुक्त व्रत रखती हैं।
- गौ-वंश के प्रति कृतज्ञता : धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गाय में 33 कोटि देवी-देवताओं का वास होता है। इस दिन गाय और उसके बछड़े की पूजा करके उनके प्रति आभार व्यक्त किया जाता है।
- भोजन के विशेष नियम : इस दिन चाकू से कटी हुई किसी भी चीज (जैसे फल-सब्जी) का सेवन वर्जित माना जाता है। साथ ही गाय के दूध, दही और घी का प्रयोग भी नहीं किया जाता। अंकुरित अनाज (चना, मूंग, मोठ) और बाजरा का भोग लगाया और खाया जाता है।
बछ बारस की पौराणिक कथा (पहली)
पौराणिक कथा के अनुसार, एक गांव में एक साहूकार और उसकी बहू रहते थे। साहूकार के घर में एक गाय थी, जिसका नाम ‘हंस’ और उसके बछड़े का नाम ‘दूध’ (कहीं-कहीं बछड़ों का नाम ‘गेहूला’ और ‘वत्सला’ भी बताया जाता है) था।
एक दिन साहूकार की सास ने अपनी बहू से कहा कि आज बछ बारस है, इसलिए “गेहूला और वत्सला को पका लेना” (गेहूला और वत्सला से उनका तात्पर्य गेहूं और बाजरा पकाने से था)। परंतु बहू भूलवश समझ नहीं पाई और उसने गाय के बछड़े को ही काटकर पका दिया।
जब साहूकार की सास घर लौटी और उसने पूरा माजरा देखा तो वह स्तब्ध रह गई। उसने तुरंत उस पकाए हुए भोजन को एक बर्तन में भरकर मिट्टी में गाड़ दिया ताकि गाय को इसका पता न चले। शाम को जब गाय चरकर घर वापस आई और अपने बछड़े को न पाकर रंभाने लगी, तब उसने उस जगह की मिट्टी को अपने खुरों से खोदना शुरू कर दिया जहां बर्तन दबाया गया था।
गाय के खुर मारते ही मिट्टी के नीचे से वह बछड़ा जीवित होकर बाहर निकल आया। यह देखकर साहूकार का पूरा परिवार और गांव वाले हैरान रह गए। सभी ने गौ-माता की महिमा को प्रणाम किया और तभी से संतान की लंबी उम्र तथा उनकी रक्षा के लिए हर वर्ष बछ बारस पर गाय और बछड़े की पूजा करने की परंपरा शुरू हुई।
बछ बारस की व्रत कथा (दूसरी)
बछ बारस की कथा के अनुसार एक सास-बहू थीं। एक दिन सास को जंगल में गाय चराने जाना था और उसी दिन भाद्रपद मास की बछ बारस थी। सास जाते हुए बहू से बोली, “मैं गाय चराने जंगल जा रही हूं, तुम गेहूंले-जौले (गेहूं और जौ) को उबाल लेना।” दरअसल, ‘गेहूंले’ और ‘जौले’ उनके गाय के बछड़ों के नाम भी थे। बहू चिंता में पड़ गई कि सास ने बछड़े को उबालने के लिए क्यों कहा है? लेकिन सास ने गेहूं और जौ को उबालने के लिए कहा था पर बहू ये समझ न पाई और उसने सास की आज्ञा का पालन करते हुए गेहूं-जौ की जगह बछड़े को उबाल दिया।
जब गाय चराकर सासूजी घर लौटीं, तो बहू से बोलीं, “बहू! आज बछ बारस है, इसलिए गेहूंले-जौले को छोड़ो पहले गाय और बछड़े की पूजा करेंगे।” यह सुनकर बहू डर के मारे कांपने लगी और मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने लगी, “हे बछ बारस माता! मेरी लाज रखना।”
उसकी सच्ची विनती सुनकर बछ बारस माता की कृपा हुई और हांडी तोड़कर गाय के बछड़े जीवित बाहर आ गए। बछड़ों के गले में हांडी का टुकड़ा लटका रह गया था, जिसे देखकर सासूजी बोलीं, “बहू! यह क्या है?” तब बहू ने रोते हुए सासूजी को सारी बात बता दी और कहा, “सासूजी! बछ बारस माता ने मेरी लाज रख ली। भगवान ने मेरा सत रखा और बछड़ों को जीवनदान दिया।”
कहा जाता है कि इसी कारण बछ बारस के दिन गेहूं, गाय के दूध और उससे बने उत्पादों का सेवन नहीं किया जाता है। साथ ही, इस दिन चाकू या किसी भी धारदार वस्तु से कटे हुए फल व सब्जियों का सेवन भी वर्जित माना जाता है।
हे बछ बारस माता! जैसे आपने सास-बहू की लाज रखी, वैसे ही सब पर अपनी कृपा बनाए रखना।
बोलो बछ बारस माता की जय! गौ माता की जय!


