September 2, 2026
MG NEWS

मरुधर गूंज, बीकानेर (01 सितम्बर 2026)।

निकाय चुनाव की सरगर्मी अब केवल राजनीतिक दलों के कार्यालयों तक सीमित नहीं है। वार्डों की गलियों में चर्चाएं तेज हैं और सबसे बड़ा सवाल यही है—इस बार बीकानेर में कांग्रेस मजबूत होगी, भाजपा बाजी मारेगी या फिर निर्दलीय उम्मीदवार दोनों दलों का खेल बिगाड़ेंगे?

बीकानेर नगर निगम में 80 वार्ड हैं और इस बार का चुनाव कई मायनों में दिलचस्प माना जा रहा है।

भाजपा के पास संगठन, कार्यकर्ताओं और सत्ता पक्ष से जुड़े राजनीतिक प्रभाव का लाभ होने की संभावना है। वहीं कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पारंपरिक वोट आधार को एकजुट रखने और वार्ड स्तर पर मजबूत प्रत्याशी उतारने की होगी। लेकिन इस चुनाव को केवल भाजपा बनाम कांग्रेस मान लेना शायद सबसे बड़ी राजनीतिक भूल होगी।

निर्दलीय बन सकते हैं असली ‘गेम चेंजर’

निकाय चुनाव में वार्ड का समीकरण विधानसभा या लोकसभा चुनाव से बिल्कुल अलग होता है। यहां पार्टी के चुनाव चिन्ह से ज्यादा कई बार प्रत्याशी का व्यक्तिगत व्यवहार, मोहल्ले में पकड़, सामाजिक समीकरण और वर्षों का संपर्क काम करता है।

यही वजह है कि जिस नेता या कार्यकर्ता को पार्टी से टिकट नहीं मिला, वह निर्दलीय मैदान में उतरकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकता है। राजस्थान के मौजूदा निकाय चुनाव में भी बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवारों के मैदान में उतरने की संभावना और प्रमुख दलों के सामने बगावत संभालने की चुनौती चर्चा में है।

भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल—एकजुटता

भाजपा के पास मजबूत संगठनात्मक ढांचा है, लेकिन टिकट वितरण के बाद यदि असंतुष्ट दावेदार और उनके समर्थक अलग रास्ता अपनाते हैं, तो इसका सीधा असर वार्ड स्तर पर पड़ सकता है।

राजनीति का एक पुराना नियम है—पार्टी का वोट पार्टी के साथ रहता है, लेकिन नाराज कार्यकर्ता हमेशा पार्टी के साथ रहे, यह जरूरी नहीं।

यही बात भाजपा के लिए महत्वपूर्ण होगी।

कांग्रेस के लिए भी राह आसान नहीं

कांग्रेस के सामने मौका जरूर है, लेकिन केवल भाजपा की कमजोरी से चुनाव जीतना संभव नहीं होगा। कांग्रेस को प्रत्येक वार्ड में ऐसा चेहरा तलाशना होगा जो संगठन के साथ-साथ व्यक्तिगत रूप से भी मतदाताओं के बीच स्वीकार्य हो।

अगर कांग्रेस ने मजबूत स्थानीय चेहरों को आगे किया और संगठन एकजुट रहा, तो कई वार्डों में मुकाबला पूरी तरह बदल सकता है।

और यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है

क्या इस चुनाव में जनता पार्टी के चिन्ह पर वोट करेगी या अपने वार्ड के चेहरे पर?

यही सवाल भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

संभव है कि किसी वार्ड में भाजपा मजबूत दिखाई दे, लेकिन उसका बागी उम्मीदवार वोट काट दे। कहीं कांग्रेस का प्रत्याशी मजबूत हो, लेकिन निर्दलीय स्थानीय समीकरण बदल दे। और कहीं दोनों दलों के बीच मुकाबले का फायदा तीसरा उम्मीदवार उठा ले।

इसलिए अभी किसी एक दल को विजेता मान लेना जल्दबाजी होगी।

असल तस्वीर नामांकन वापसी के बाद और स्पष्ट होगी। बीकानेर में चुनावी मुकाबला अब धीरे-धीरे पार्टी बनाम पार्टी से निकलकर प्रत्याशी बनाम प्रत्याशी की तरफ बढ़ता दिखाई दे रहा है।

बीकानेर में इस बार सबसे मजबूत वही होगा, जो टिकट के बाद भी अपने कार्यकर्ताओं को साथ रख पाए और वार्ड की जनता के बीच अपना भरोसा कायम रख पाए।

क्योंकि निकाय चुनाव में कभी-कभी एक मजबूत निर्दलीय चेहरा पूरी पार्टी की रणनीति पर भारी पड़ जाता है।