

मरुधर गूंज, बीकानेर (09 फरवरी 2026)।
हिंदू धर्म में भगवान शिव को ‘आशुतोष’ माना गया है यानी वे जो मात्र एक लोटा जल और सच्ची भक्ति से शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। महादेव को प्रसन्न करने के लिए वैसे तो कई मंत्र और चालीसा प्रचलित हैं, लेकिन शास्त्रों में ‘परमेश्वर स्तुति स्तोत्र’ को विशेष स्थान दिया गया है।
मान्यता है कि यह स्तोत्र न केवल जीवन की बाधाओं को दूर करता है, बल्कि साधक को आध्यात्मिक शांति और सकारात्मकता से भर देता है।
विराट स्वरूप की महिमा : क्या है इस स्तोत्र का आधार?
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, ‘परमेश्वर स्तुति स्तोत्र’ महादेव के उस कल्याणकारी और विराट स्वरूप को समर्पित है, जो सृष्टि का आधार है। आध्यात्मिक जानकारों का मानना है कि जब व्यक्ति खुद को संकटों से घिरा हुआ पाता है, तब इस स्तोत्र का पाठ एक ‘अमोघ शक्ति’ की तरह काम करता है। यह भक्त के अंतर्मन की शुद्धि कर आत्मविश्वास को जागृत करने में सहायक होता है।
नियमित पाठ से मिलने वाले चमत्कारी लाभ
ज्योतिष और धार्मिक विशेषज्ञों के अनुसार, इस स्तुति के नियमित जाप से कई दिव्य लाभ प्राप्त होते हैं-
मानसिक तनाव से मुक्ति – इस स्तोत्र की विशिष्ट ध्वनियां और शब्द विन्यास मस्तिष्क को शांत करने और एकाग्रता बढ़ाने में प्रभावी माने जाते हैं।
नकारात्मकता का नाश – घर और कार्यस्थल पर मौजूद नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करने के लिए इसे अत्यंत प्रभावशाली माना गया है।
पाप शमन और मोक्ष – पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धापूर्वक किया गया यह पाठ अनजाने में हुए पापों के प्रभाव को कम करता है और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग सुगम बनाता है।
कार्य सिद्धि – जीवन में आ रही अनचाही बाधाएं और रुकावटें महादेव की कृपा से दूर होने लगती हैं।
पाठ की सही विधि और नियम
किसी भी स्तोत्र का पूर्ण फल तभी मिलता है जब उसे विधि-विधान से किया जाए। ‘परमेश्वर स्तुति स्तोत्र’ के लिए निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक है :-
समय और स्वच्छता – ब्रह्म मुहूर्त या सुबह स्नान के बाद स्वच्छ सफेद या केसरिया वस्त्र पहनकर पाठ करना सबसे उत्तम है।
पूजन सामग्री – भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग के समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित करें।
विशेष दिन – वैसे तो इसका पाठ प्रतिदिन फलदायी है, लेकिन सोमवार, प्रदोष व्रत या शिवरात्रि के दिन इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
पूर्णता – पाठ संपन्न होने के बाद महादेव को बेलपत्र और जल अर्पित करें, यह पूजा की पूर्णता का प्रतीक माना जाता है।
विशेष टिप – यदि आप संस्कृत उच्चारण में सहज नहीं हैं, तो इसके अर्थ को समझते हुए शांत मन से श्रवण करना भी लाभकारी होता है।


