

मरुधर गूंज, वाराणसी (05 फरवरी 2026)।
काशी केवल एक नगर नहीं, बल्कि मोक्ष की नगरी और एक महान ऊर्जा केंद्र है। यहाँ बहने वाली ‘उत्तरवाहिनी’ गंगा का आध्यात्मिक महत्व अद्वितीय है। हालांकि, शास्त्रों और विद्वानों के अनुसार काशी से गंगाजल घर लाने को लेकर कुछ विशेष नियम और सावधानियां बताई गई हैं, जिन्हें अनदेखा करना भारी पड़ सकता है।
क्यों है काशी का गंगाजल विशेष?
आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार, काशी त्याग और विसर्जन की ऊर्जा वाली नगरी है। यहां के गंगाजल में ‘शिव तत्व’ की प्रधानता होती है। यह जल इतना शक्तिशाली माना जाता है कि इसकी पवित्रता को सामान्य घरेलू वातावरण में बनाए रखना अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है। यदि घर में पूर्ण सात्विकता न हो, तो इस दिव्य जल की ऊर्जा का संतुलन बिगड़ सकता है।

मर्यादा भंग होने पर मिल सकते हैं नकारात्मक परिणाम
विद्वानों का मानना है कि यदि गंगाजल की मर्यादा भंग होती है, तो इसका सकारात्मक प्रभाव नकारात्मकता में बदल सकता है। आधुनिक जीवनशैली में जहाँ अक्सर क्रोध, झूठ या तामसिक भोजन का प्रवेश हो जाता है, वहाँ इस पवित्र जल को रखना घर में अशांति या क्लेश का कारण बन सकता है।
इन कड़े नियमों का पालन है अनिवार्य
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यदि आप काशी से गंगाजल घर लाते हैं, तो शास्त्रों के अनुसार इन नियमों का पालन करना आवश्यक है…
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पूर्ण सात्विकता: घर में मांस-मदिरा का सेवन पूरी तरह वर्जित होना चाहिए।
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पवित्र स्थान: जल को सदैव ऊंचे, स्वच्छ और प्रकाशयुक्त स्थान पर रखें; इसे कभी अंधेरे में न रखें।
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शुद्ध आचरण: घर में अपशब्दों, झूठ और कलह से बचें, अन्यथा जल की ऊर्जा दूषित हो सकती है।
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स्पर्श की शुद्धि: कभी भी अपवित्र या गंदे हाथों से पात्र को न छुएं।
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साधना का भाव: जल को केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि शिव स्वरूप मानकर उसकी सेवा और सम्मान करें।


