

मरुधर गूंज, बीकानेर (13 जनवरी 2026)।
वैदिक पंचांग के अनुसार इस वर्ष में मकर संक्रांति का पावन पर्व 14 जनवरी, 2026 बुधवार को मनाया जाएगा। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे।
इस अवसर पर गंगा स्नान और दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है, जिससे न केवल पापों से मुक्ति मिलती है बल्कि भगवान विष्णु और सूर्य देव का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है।
स्नान और पूजा का विशेष महत्त्व
मकर संक्रांति के दिन पवित्र नदियों, विशेषकर गंगा जी में स्नान करने की परंपरा है। मान्यता है कि इस दिन किया गया स्नान जातक के सभी अनजाने पापों को धो देता है।
यदि गंगा तट पर जाना संभव न हो, तो घर पर ही नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान किया जा सकता है। स्नान के पश्चात सूर्य देव को अर्घ्य देकर उनकी साधना करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
राशि अनुसार करें ये दान
ज्योतिषियों के अनुसार, यदि इस दिन अपनी राशि के अनुरूप वस्तुओं का दान किया जाए, तो जीवन में सुख-समृद्धि और सकारात्मकता का संचार होता है। यहाँ देखें किस राशि के लिए क्या दान करना शुभ रहेगा।
राशि अनुसार दान
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मेष – मकर संक्रांति के दिन गुड़, मूंगफली और चिक्की का दान करें।
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वृषभ – मकर संक्रांति के दिन सफेद तिल, चावल और आटा का दान करें।
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मिथुन – मकर संक्रांति पर हरी सब्जी और मूंग दाल का दान करें।
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कर्क – मकर संक्रांति के दिन चावल, दूध, चीनी और सफेद तिल का दान करें।
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सिंह – सूर्य देव की कृपा पाने के दिन गुड़, मूंगफली और तिल के लड्डू का दान करें।
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कन्या – मकर संक्रांति के दिन मूंग दाल की खिचड़ी लोगों में वितरित करें।
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तुला – मकर संक्रांति के दिन सफेद वस्त्र और सफेद तिल का दान करें।
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वृश्चिक – मकर संक्रांति के दिन गेहूं, गुड़ और लाल कंबल का दान करें।
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धनु – मकर संक्रांति के दिन चने की दाल और पीले वस्त्र का दान करें।
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मकर – मकर संक्रांति के दिन काले तिल और कंबल का दान करें।
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कुंभ – मकर संक्रांति के दिन उड़द की दाल और चमड़े के जूते-चप्पल का दान करें।
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मीन – मकर संक्रांति के दिन उड़द दाल की खिचड़ी बनाकर जरूरतमंदों के मध्य वितरित करें।
सूर्य देव के इन मंत्र करें जाप
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ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजो राशे जगत्पते, अनुकंपयेमां भक्त्या, गृहाणार्घय दिवाकर:।।
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जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम । तमोsरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोsस्मि दिवाकरम ।।
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ऊँ आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यण्च । हिरण्य़येन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन ।।
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ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणराय मनोवांछित फलम् देहि देहि स्वाहा।।
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ऊँ आदित्याय विदमहे दिवाकराय धीमहि तन्न: सूर्य: प्रचोदयात ।।


